शिक्षक
गुरुवर के चरणों की रज से भाल पे चन्दन करती हूँ
जीवनधरा पर आच्छादित व्यवहार आप ही हो
द्रढता से खड़ी इमारत का आधार आप ही हो
काँटों के मध्य मैं जाकर जो पुष्प आपने बोये थे
उन्ही फूलों को शब्द रूप मैं पावन चरणों मैं धरती हूँ
मैं अकिंचन सहज भाव से----
मंजिल अपनी पाने को सब भरसक जोर लगते हैं
पाकर हाथों में साकार स्वप्न स्वयं पर ही इतराते हैं
हमको सतपथ दिखलाकर दूर खड़े होने वाले
अपनी जीवन ले का सब श्रेया समर्पण करती हूँ
मैं अकिंचन सहज भाव से -----
शिक्षा ,शुचिता सहृदयता बातें कई सिखलाई हैं
घोर तिमिर हरके मन का ज्ञान की अलख जगाई है
धरती सा धीरज धर के ज्ञानार्पण करने वाले हो
निष्प्राण स्वप्न के तन मैं प्राण फूंकने वाले हो
मैं माना उथलापन हूँ पर तुम उसकी गहराई हो
बची हैं शेष जो भी कमियाँ तुम उनकी भर पायी हो
अपने हिय के भावों को कुछ शब्द आचमन करती हूँ
मैं अकिंचन सहज भाव से आपका वंदन करती हूँ
गुरुवार के चरणों की रज से भाल पे चन्दन करती हूँ
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