सोच ही जड़ है


 


                                      

 

 

                                       सोच ही  जड़ है  !

 

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सोच ही जड़ है

 ज़िन्दगी में बहुत हासिल करने के बाद भी इंसान कभी पूरी तरह खुश नहीं रह  पाता  उसका सबसे बड़ा कारन उसकी जड़ें हैं जो है उसकी सोच है । सोच अच्छी है या बुरी ये तो कोई किसी और के लिए ही कह सकता है.लेकिन कहने का आधार उसकी अपनी सोच और संस्कार हैं। संस्कार वह नहीं जो उसे उसके घर से मिले हैं बल्कि उसने  हमेशा जिन  विचारों को अपनाया है ,जिया है ,और महसूस किया है। इंसान जीवन पर्यन्त उन्ही संस्कारों मैं जीता है.लेकिन किसी एक जगह आकर उसे महसूस होने लगता है कि  कही कुछ तो है जो उसकी प्रसन्नता का बाधक है। मनुष्य उस वक़्त स्वयं ही तृप्त और प्रसन्न हो जाता है जब वह सोच को स्वक्छंद छोड़ देता है। मुक्त कर देता है स्वयं के मस्तिष्क की शांकलों। और प्रसन्नर  हने के आधारभूत करननो  को प्राप्त कर लेता है । ऐसी स्वक्षन्दता जो उसे कितनी ही दूर ले जाये मगर वह मूल से जुड़ कर रहता है। और ये मूल किसी व्यक्ति विशेष या समाज विशेष के नहीं वरन हर जीवित मनुष्य के होते हहैं जिन्हें पाने मैं ,समझने मैं वह राह भटक जाता है 


हम इसे उसी तरह समझ सकते हैं जैसे  हर प्रकार की फसल को मूल रूप से जिन वस्तुओं की आवश्यकता है मिलने पर वह लहलहा उठती हैं और प्रतिकूलता मैं मुरझा जाती हैं यही नियम मनुष्य की प्रसन्नता से जुड़ा हैअगर आवश्यक भोजन मष्तिष्क को मिले तो मन और जीवन समृद्ध हो ही जाते है अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं,. 

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