शीश पे धरे वेदऔर पुरान जन को
अज्ञान तिमिर से भरे स्वयं के मन को
आखिर कब तक मरे हुए को मारोगे
स्वयं के भीतर सुप्त पड़े पापी मन को
दया करो अब तो मर जाने दो रावण को
रावण से बधढकर दम्भी और कुकर्मी हो
अधर्मी ,पापी ,कपट भरे असंयमी हो
परनार को अपहृत क्या तुमने नहीं किया
क्यूँ बढते हो हर बार
उस एक रावण शब्द स्वरुप प्रज्जवलन को
दया करो अब तो मर जाने दो रावण को
सब राम हैं तो डरी हुयी क्यों सीता है
स्त्री छोडो बाला भी आज सभीता है
अब कौन सी आग जलाये इस लोलुपता को
नहीं देखा जाता इस झूठे द्रश्य के मंचन को
दया करो अब तो मर जाने दो रावण को
वो रावण तो गया उदधार हुआ है उसका
अब निरखो अपने आस पास के जीवन को
गिनो एक एक करके निर्लज्ज आनन् को
ढूंढो और करो दहन क्रूर आचरण को
दया करो अब तो मर जाने दो रावन को
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