वक्त से माँगा एक छोटा कोना .वही कोना बेतरतीब बिखरने के लिए | जहाँ बिखरी पड़ी रहूँ मैं या जहां बैठकर बटोर लाऊं खुद को | हाँ वही कोना जहाँ हवा मेरी साँसों की तरह कभी मध्हम तो कभी तेज होती रहे | वही कोना जहां बावलापन सवार हो बच्चे सा मुझमें|जहां कुछ बिसार दूँ तो कुछ याद भी आ जाये| हाँ मुझे पल पल निहारता कोना | जहाँ से दिखाई दे एक असमान की नीली नदी और उसमें तैरते अनेको पंछी मुझे देखकर पुकारने लगें |
शीशे की एक बड़ी सी खिड़की ने अलग ना किया हो तो बालकनी से झांकते गुलाब का नटखट काँटा चुभ ही जाये जब देखूं गुलाब को|
हाँ एक पढने का कोना,कुछ गढ़ने का कोना|स्याही मैं डुबो डुबोकर आँखों को सुखाने का कोना|
बस यही छोटा मगर बहुत विस्तृत सा एक कोना ज़िन्दगी भर की कमाई दौलत से भी कई बार नहीं मिल पता |
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